संस्कृति और विरासत
भारतीय तीर्थ स्थलों से न केवल आध्यात्मिक भक्ति भाव एवं आत्म शक्ति का ही प्रादुर्भाव होता है अपितु भाव अभिव्यक्ति हेतु संपूर्ण कला आयाम और संस्कृति की धारा प्रवाहित होती है।
अयोध्या का सभी तीर्थों में महात्म्य सर्वोपरि है, अयोध्या में मंदिरों, साधु-संतो तथा जनजीवन के परंपराओं में कला और संस्कृति समाहित है। अयोध्या की कला एवं संस्कृति पर स्पष्ट रूप से वैष्णव, शैव, शाक्य, सौर तथा जैन बौद्ध पंथ का प्रभाव व्याप्त है। साथ ही लंबे समय तक नवाबों का निवास होने से वास्तु कला तथा जनजीवन जैसे पाक, वस्त्र, उपयोगी वस्तुओं आदि पर नवाबी कला का प्रभाव दिखाई पड़ता है। अयोध्या की वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला, काव्य, संगीत, प्रदर्शन कला एवं लोक कलाओं में व्याप्त मानवीय एवं रसात्मक तत्व एवं आनंद कला के विभिन्न माध्यमों से प्राप्त है।
अयोध्या की चित्रकला भित्तिचित्रों के माध्यम से उत्कृष्ट पौराणिक कृतियों का समावेश है। वर्तमान में यह फ्रेसको पद्धति से निर्मित मंदिरों की दीवारों पर क्षति पूर्ण स्थिति में प्राप्त है यह दो सौ से ढाई सौ वर्ष पुरातन स्थानीय अयोध्या शैली पर आधारित है।
अयोध्या की मूर्ति कला पर उपरोक्त वर्णित सभी पंथो का प्रभाव समाहित है। पाल, प्रतिहार, पल्लव, चालुक्य, राष्ट्रकूट, चंदेल, रहमानसमान परमार तथा गढ़वाल आदि विभिन्न राजवंशों द्वारा कला एवं संस्कृति के लिए मूर्ति स्वरूपों को विस्तृत अवसर प्राप्त हुआ। मूर्तिकला के इतिहास में आठवीं से बारहवीं सदी के मध्य की अवधि अत्यधिक महत्वपूर्ण है, गुप्तकालीन अयोध्या में प्राप्त मूर्तियों के निर्माण में वैज्ञानिक आधार विकसित शास्त्रीय स्वरूप ग्रहण कर चुका था।
अयोध्या वास्तुकला का प्राचीन काल से ही अत्यधिक समृद्ध स्वरूप का वर्णन भारतीय ग्रंथों से प्राप्त है। किंतु ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर अयोध्या ने अनेक आक्रामक आक्रोश का दंश सहा है। विपरीत परिस्थितियों में भी अयोध्या की वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण अस्तित्व है, नागर शैली, गाहड़वाल शैली, ब्रिटिश एवं नवाब शैली का प्रभाव देखने को मिलता है। 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में निर्मित अयोध्या वास्तुकला का उदाहरण वर्तमान में भी विद्यमान है। इन भवनों के निर्माण कार्य मे कच्चे-पक्के ईटो, गारे तथा मार्बल व लाल बलुआ पत्थर इत्यादि माध्यमों का प्रयोग किया गया है।
काव्य कला में अयोध्या शिरोमणि है, महाकाव्य की रचना हो, या वेद-पुराणो में अयोध्या का वर्णन दोनों ही स्थितियों में भारतीय साहित्य में विशेष महत्वपूर्ण योगदान प्राप्त है। संत, विद्वान, राम भक्त, रसिक संप्रदाय, आध्यात्मिक साधन के इतिहास के मर्मज्ञ आदि साहित्य प्रेम विशेष बहुत मूल्यवान सामग्री के रूप में अयोध्या से प्राप्त हैं। भारतीय भक्ति साहित्य में भी रस-साधन की एक स्पष्ट धारा का निर्देशन मिलता है, सनातन धर्म, जैन, बौद्ध व मुगल पंथ के साहित्य दर्शन में अयोध्या काव्य कला रसस्वरूप है। संस्कृत, पाली, ब्रह्मि, हिंदी, अरबी, फारसी आदि भाषाओं में ग्रंथों का वर्णन बहुतायत किया गया है।
अयोध्या की संगीत कला व प्रदर्शन कला परंपरागत विषय के सार्थक रूप में प्राप्त हैं। मंदिरों में धार्मिक रूप से भजन भाव से, त्योहारों, उत्सवों, मेला, अनुष्ठानों व लोक संगीत-नृत्य मे विस्तृत ख्याति प्राप्त हैं। गायन, वादन तथा नर्तन शास्त्री पद्धतियों में स्वतंत्र विकास क्रम में अयोध्या भारतीय संस्कृति का प्राचीनतम महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु रहा। रामनवमी, जानकी नवमी, गुरु पूर्णिमा, श्रावण झूला, अन्नकूट, हनुमान जयंती, फागुन, मकर संक्रांति, बुढ़वा मंगल, शरद पूर्णिमा, महाशिवरात्रि, नवरात्रि इत्यादि पर्वों पर संगीत नृत्य और राम कथा लीला का रसिक भावपूर्ण प्रदर्शन होता है।
झूलन, कजरी, रसिया, होरी गायन, अष्टयाम सेवा गायन, अवधि पखावर, रामविवाह गायन, जन्म उत्सव गायन इत्यादि की परंपरा अयोध्या गायन की अति प्राचीनतम विधा रही है। पंडित राम पदारथ, पंडित किशोरी शरण, राजकुमार, पंडित दयाशंकर मिश्र, पंडित चंद्र प्रकाश मिश्र, पंडित ओम प्रकाश महाराज आदि अयोध्या रियासत के बड़े कलाकार हुए।
महाराजा कुदाऊ सिंह का घराना पखावज वादन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है विअहुति भवन मंदिर में राम विवाह संगीत मिथिला के लोक अवध की संस्कृति में अष्टयाम सेवा, रामार्चा एवं विवाह तीन श्रेणियों में गाया जाता है। बेगम अख्तर मुबारकबादी, कजरी, ठुमरी ठप्पा और दादरी, चैती, होरी, आदि अर्थ शास्त्रीय गायन की अयोध्या की सुविख्यात गायिका रही है।
नृत्य कला अयोध्या के मंदिरों में जीवित रही है, राम विवाह, रास, बधाई जैसे अवसरों पर नृत्य उल्लास को व्यक्त करने की अवस्था रही। मंदिरों में कथिक अन्य जिलों से आकर अपनी प्रस्तुति करते थे, घुंघट और घुंघरू धारण कर हारमोनियम, तबला, सारंगी, मृदंग, झांझ आदि वाद्यों की संगति प्रमुखता से प्रस्तुति की जाती है। कथिक नृत्य के समय कुर्ता पजामा और कमर में दुपट्टा विशेष वेशभूषा आकर्षण का केंद्र होते है।
प्रदर्शन कला के अंतर्गत ही रामलीला मंडली की भी प्रस्तुति होती है मनोहर दास, रामप्रिया दास, गुलाब दास, सरस्वती दास, लाल दास, तुलसीदास, भगवत दास, हनुमान दास आदि संत महात्माओं द्वारा अयोध्या के विभिन्न मंदिरों में रामलीला मंडली का बड़ा, आयोजन परम्परागत किया जाता रहा है। रामलीला मंडली की वेशभूषा व भाषा अयोध्या की लोक कला से प्रभावित होकर भावपूर्ण रूप से समाहित है।
अयोध्या की लोक कला जन समाज के उत्सव, कर्मकांड संस्कार लोक परंपरा पर आधारित है, जीवनानुभवो व, धार्मिक परंपरागत मान्यताओं के आधार पर, सौंदर्य कलात्मक लोक अभिव्यक्ति एक सहज अनुभूति है।
ग्राम देवता, कुल देवता, मातृका, हाथी, घोड़े, मोर, सुगा, आम, अमरूद इत्यादि लोकाचारों में प्रतीकात्मक रूप से अंकित किए जाते हैं। विवाह, जन्म, मृत्यु, कर्मकांड इत्यादि अवसरों पर इनका चित्रण किया जाता है।
चावल-गेहूं का आटा, हल्दी, कुमकुम, सिंदूर, काजल आदि का प्रयोग रंगों के रूप में तथा धरातल को गोबर मिट्टी से लिप कर तैयार कर प्रयोग किया जाता है। बांस की कूची, हाथ की उंगलियों व लकड़ी में कपड़ा बांधकर तूलिका के रूप में प्रयोग लाया जाता है ज्यामितीय आकार का प्रतीकात्मक अत्यधिक प्रयोग होता हैं। इन चित्रों को तैयार करते हुए लोकगीत जैसे सोहर, देवी गीत, बिरहा गीत, विवाह इत्यादि गायन व नृत्य का भी प्रस्तुति जाती है।
अयोध्या का फरूवाही लोक नृत्य है जो हनुमान की वेशभूषा धारण कर लोग गायन के माध्यम से नाटकीय रूप से रामकथा का प्रस्तुतीकरण किया जाता है।
अयोध्या की कला और संस्कृति भारतीय इतिहास व सौंदर्य का प्राचीनतम अभिन्न अंग है जो मानव समाज को अध्यात्मिक आनंदपूर्ण जीवन की ओर अग्रसर करता है।